Monday, 15 October 2012

मोम का चाँद



अपने हाथों की लकीरों को मिटाकर
गढ़ती है वह अपनी भाग्य लिपि
उसके सपने आँखों में नहीं पेट में तैरते हैं
पूनम की बदरंग रात में
लोरी सुनाती है अपने दुधमुँहे बच्चे को
अल सुबह नाले-नौचक्कों और कचरे के ढ़ेर से
पन्नी बीनते उसके भाई-बहनों की
बच्चा टुकुर-टुकुर
काले आसमान में
मटमैले  चाँद को देखता है,
जैसे कह रहा हो
माँ 
मैं बड़ा होकर
चाँद से पन्नी बीन कर लाऊँगा।

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