अपने हाथों की लकीरों को मिटाकर
गढ़ती है वह अपनी भाग्य लिपि
उसके सपने आँखों में नहीं पेट में तैरते हैं
पूनम की बदरंग रात में
लोरी सुनाती है अपने दुधमुँहे बच्चे को
अल सुबह नाले-नौचक्कों और कचरे के ढ़ेर से
पन्नी बीनते उसके भाई-बहनों की
बच्चा टुकुर-टुकुर
काले आसमान में
मटमैले चाँद को देखता है,
जैसे कह रहा हो
माँ
मैं बड़ा होकर
चाँद से पन्नी बीन कर लाऊँगा।
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