Thursday, 6 September 2012

अहसास


तुम्हारे निकट क्या है
मैं नहीं जानता
लेकिन मेरे पास एक वीणा है
जो बज उठती है
प्राण की लय में
अमावस की गहन
रेतीली बर्फ में
पौ फटती है
मैं कहीं दूर चला जाता हँू
तब स्वर शर से बिंधा
मेरा मन आल्हादित होकर
उठा लेता है
पूरा आसमान कंधों पर
और यूँ ही
ढ़ोया करता हूँ
मीलों कच्चे-पक्के सपने
लगता है कि शब्द
ताल देते हैं
जब भावना का विहग
उतरता है
खुली अटारी पर
और
मस्त होकर नाचता है।