Wednesday, 17 October 2012


मैंने मानवता को मरते देखा है
पग-पग पर रक्त बहते देखा है

इन्सानियत सिसकती दम तोड़ती,
इन्सान को हैवान बनते देखा है

जो थे नियत घर की रक्षा हेतु
उन्हें ही चमन में आग लगाते देखा है

माँ बहनों की चीख पुकारें
उनकी अस्मत अपनों से लुटते देखी है

ईमानदार भूखे मरते देखे मैंने
बेईमानों को मौज मनाते देखा है

विद्वान पग-पग पर होते लांच्छित
मूर्खों की इज्जत होते देखा है

देश-भक्तों को नित लगती फाँसी
गद्दारों को गद्दी पाते देखा है

Monday, 15 October 2012

मोम का चाँद



अपने हाथों की लकीरों को मिटाकर
गढ़ती है वह अपनी भाग्य लिपि
उसके सपने आँखों में नहीं पेट में तैरते हैं
पूनम की बदरंग रात में
लोरी सुनाती है अपने दुधमुँहे बच्चे को
अल सुबह नाले-नौचक्कों और कचरे के ढ़ेर से
पन्नी बीनते उसके भाई-बहनों की
बच्चा टुकुर-टुकुर
काले आसमान में
मटमैले  चाँद को देखता है,
जैसे कह रहा हो
माँ 
मैं बड़ा होकर
चाँद से पन्नी बीन कर लाऊँगा।