आजादी के बाद भारत की राजनीति में एक खास किस्म का लोकतंत्र बहुत तेजी से पनपा है। पनपता भी क्यों नहीं उसके लिए विभिन्न जातियों में विभाजित गरीब और निरक्षर समाज की हरी-भरी फसल जो लहलहा रही थी। भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर अपने खिलंदड़ अंदाज में कुछ शब्द उछालते हुए दद्दू भइया ने मेरे ज्ञान को परखने की कोशिश की। मैं उनके आशय को समेटता इससे पहले ही वे भारतीय लोकतंत्र पर अपने सुर साधने लगे- तुम ही बताओ भईया! किस देश का लोकतंत्र ऐसा है जहाँ भ्रष्टाचार इतनी गरिमा और सहजता से स्वीकार किया जाता है? कौन सा देश ऐसा है जहाँ ईमानदारी से सरकार या सरकार से भी ऊँची हैशियत वाला कोई राहुल यह स्वीकार करे कि सरकार द्वारा जनता के लिए स्वीकृत एक रूपये में से जनता के पास सिर्फ पन्द्रह पैसे ही पहुँच पाते हैं। पिच्चासी पैसे कहाँ जाते हैं? और क्यों जाते हैं? इसके बारे में किसी सवाल की गुंजाइश नहीं, क्योंकि ये इतने आसान सवाल हैं कि इनके उत्तर सब जानते हैं। है न भईया लोकतंत्र।
दद्दू भईया ने मुँह की कठसुपारी को फेंकते हुए कहा, अरे भई! तुम ही बताओ, अब अगर किसी आयोग के अध्यक्ष का बेटा कहीं घूस लेते हुए पकड़ा गया तो उसमें बेचारे अध्यक्ष की क्या गलती है? और फिर उसके बेटे के घर में एक आध हथियार-वथियार बरामद हो भी गये तो कौनो जुलुम आ गया। जब पूरी बिरादरी के उद्धार का लाइसेंस ले ही रखा है तो हथियार का लाइसेंस कौनो जरूरी है? पूरा जीवन देश सेवा में लगाया है, कभी परिवार की सुध नहीं ली। बेटा क्या करता है? कहाँ जाता है? किससे मिलता है? यह सब जानने की फुरसत ही कहाँ थी? देश सेवा में ही तो लगे रहे। सो अब वे इस्तीफा क्यों दें? लोकतंत्र है भईया।
दद्दू भईया ने राजनीति की अपनी समझ पर गरदन उचकाते हुए कहा- अब तुम्हें क्या बताएँ? कल ही तो खबर पढ़ी थी बादलों की बेरूखी से तंग आकर सरकार ने देश के कुछ हिस्सों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है। दद्दू भईया ने अपने ऊँचे स्वर को ढ़ीला छोड़ते हुए कहा- मैंने सुना है कि एक प्रदेश में हजारों करोड़ रूपये खर्च करके मिट्टी के बड़े-बड़े हाथी बनाए जा रहें हैं जो अपनी विशाल सूँडों से बादलों को दूसरे प्रदेशों में जाने से रोक देंगे। मैने यह भी सुना है कि इन हाथियों का निर्माण एक खास प्लानिंग के तहत किया जा रहा है। एक तो यह कि इससे लोगों में अपनी मिट्टी के प्रति प्यार की भावना पैदा होगी क्यों कि इन हाथियों के निर्माण में शुद्ध देशी मिट्टी का प्रयोग किया गया है। दूसरा यह कि बारिश का देवता इन्द्र है और इन्द्र का वाहन हाथी। अब जब इन्द्र आसमान पर भ्रमण करते हुए अपने इतने सारे वाहन देखेगा तो भ्रमित हो जाएगा। नीले-भूरे हाथियों के बीच इन्द्र अपने सफेद ऐरावत को ढूँढते हुए आसमान में छाई राजनीति की धुँध को साफ करने के लिए पानी बरसायेगा। बारिश होती रहेगी, हाथी नहाते रहेंगे और प्रदेश में खुशहाली की बाढ़ आती रहेगी। हाथियों का शिल्प जितना सुन्दर और आकर्षक होगा प्रदेश उतना ही अधिक तरक्की करेगा। शिक्षा का स्तर उतना ही ऊँचा उठेगा। हाथियों की बदौलत प्रदेश हराभरा एवं खुशहाल हो जायेगा। यही तो लोकतंत्र है भईया।

