Saturday, 11 February 2012

दद्दू भईया का लोकतंत्र


आजादी के बाद भारत की राजनीति में एक खास किस्म का लोकतंत्र बहुत तेजी से पनपा है। पनपता भी क्यों नहीं उसके लिए विभिन्न जातियों में विभाजित गरीब और निरक्षर समाज की हरी-भरी फसल जो लहलहा रही थी। भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर अपने खिलंदड़ अंदाज में कुछ शब्द उछालते हुए दद्दू भइया ने मेरे ज्ञान को परखने की कोशिश की। मैं उनके आशय को समेटता इससे पहले ही वे भारतीय लोकतंत्र पर अपने सुर साधने लगे- तुम ही बताओ भईया! किस देश का लोकतंत्र ऐसा है जहाँ भ्रष्टाचार इतनी गरिमा और सहजता से स्वीकार किया जाता है? कौन सा देश ऐसा है जहाँ ईमानदारी से सरकार या सरकार से भी ऊँची हैशियत वाला कोई राहुल यह स्वीकार करे कि सरकार द्वारा जनता के लिए स्वीकृत एक रूपये में से जनता के पास सिर्फ पन्द्रह पैसे ही पहुँच पाते हैं। पिच्चासी पैसे कहाँ जाते हैं? और क्यों जाते हैं? इसके बारे में किसी सवाल की गुंजाइश नहीं, क्योंकि ये इतने आसान सवाल हैं कि इनके उत्तर सब जानते हैं। है न भईया लोकतंत्र। 

दद्दू भईया ने मुँह की कठसुपारी को फेंकते हुए कहा, अरे भई! तुम ही बताओ, अब अगर किसी आयोग के अध्यक्ष का बेटा कहीं घूस लेते हुए पकड़ा गया तो उसमें बेचारे अध्यक्ष की क्या गलती है? और फिर उसके बेटे के घर में एक आध हथियार-वथियार बरामद हो भी गये तो कौनो जुलुम आ गया। जब पूरी बिरादरी के उद्धार का लाइसेंस ले ही रखा है तो हथियार का लाइसेंस कौनो जरूरी है? पूरा जीवन देश सेवा में लगाया है, कभी परिवार की सुध नहीं ली। बेटा क्या करता है? कहाँ जाता है? किससे मिलता है? यह सब जानने की फुरसत ही कहाँ थी? देश सेवा में ही तो लगे रहे। सो अब वे इस्तीफा क्यों दें? लोकतंत्र है भईया। 

दद्दू भईया ने राजनीति की अपनी समझ पर गरदन उचकाते हुए कहा- अब तुम्हें क्या बताएँ? कल ही तो खबर पढ़ी थी बादलों की बेरूखी से तंग आकर सरकार ने देश के कुछ हिस्सों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है। दद्दू भईया ने अपने ऊँचे स्वर को ढ़ीला छोड़ते हुए कहा- मैंने सुना है कि एक प्रदेश में हजारों करोड़ रूपये खर्च करके मिट्टी के बड़े-बड़े हाथी बनाए जा रहें हैं जो अपनी विशाल सूँडों से बादलों को दूसरे प्रदेशों में जाने से रोक देंगे। मैने यह भी सुना है कि इन हाथियों का निर्माण एक खास प्लानिंग के तहत किया जा रहा है। एक तो यह कि इससे लोगों में अपनी मिट्टी के प्रति प्यार की भावना पैदा होगी क्यों कि इन हाथियों के निर्माण में शुद्ध देशी मिट्टी का प्रयोग किया गया है। दूसरा यह कि बारिश का देवता इन्द्र है और इन्द्र का वाहन हाथी। अब जब इन्द्र आसमान पर भ्रमण करते हुए अपने इतने सारे वाहन देखेगा तो भ्रमित हो जाएगा। नीले-भूरे हाथियों के बीच इन्द्र अपने सफेद ऐरावत को ढूँढते हुए आसमान में छाई राजनीति की धुँध को साफ करने के लिए पानी बरसायेगा। बारिश होती रहेगी, हाथी नहाते रहेंगे और प्रदेश में खुशहाली की बाढ़ आती रहेगी। हाथियों का शिल्प जितना सुन्दर और आकर्षक होगा प्रदेश उतना ही अधिक तरक्की करेगा। शिक्षा का स्तर उतना ही ऊँचा उठेगा। हाथियों की बदौलत प्रदेश हराभरा एवं खुशहाल हो जायेगा। यही तो लोकतंत्र है भईया।

Sunday, 5 February 2012


मिलावट की कारीगरी, बाजार की बाजीगरी और सरकार की दादागिरी

भारत की आबादी कब से एक अरब पार हो चुकी है। खेतों पर कितने सारे मॉल्स एवं मल्टीप्लेक्स की फसलें उग आई हैं। कांक्रीट के जंगल हैं कि सुरसा के मुँह की तरह बढ़ते ही जा रहे हैं। भारत में आसन्न खाद्यान्न संकट पर गम्भीर होते हुए मेरे मित्र ने जमाखोरी और मिलावट के खिलाफ चलाए जा रहे सरकारी अभियान की प्रशंसा करते हुए एक आम नागरिक की चिन्ता को उजागर किया। पर उनकी इस चिन्ता से मेरे मन में कुछेक बुनियादी सवाल ठोकरें मारने लगे। पहला यह कि आजादी के समय हमारे पास किसानी के लिए जितने खेत और जमीनें थीं, आज वह लगभग आधी ही रह गयी हैं। जबकि इस मान से हमारी आबादी चौगुना बढ़ चुकी है। फिर भी हमारे देश में खाद्यान्नों की कमी नहीं। आखिर कैसे ? पैदावार में बढ़त हुई भी होगी, तो भी कितनी ? तो फिर इतनी बड़ी आबादी के लिए खाद्यान्न की पूर्ति कहाँ से होती है ? मैं सोच ही रहा था कि मेरी नजर पेपर में छपी एक खबर पर पड़ी। जिसमें सरकार द्वारा मिलावट के खिलाफ अभियान चलाये जाने के फलस्वरूप कुछ दूध एवं घी विक्रेताओं पर छापेमारी की कार्यवाही की जा रही थी। पर मुझे इसमें साफ तौर पर सरकार की दादागिरी दिखाई दे रही थी। अरे भई ये भी कोई बात हुई ? एक तो इतनी मंहगाई में भी ये लोग मिलावट करके दूध के दाम इतने कम और स्थिर रखे हुए हैं। फिर चाहे कितनी भी डिमांड हो लोगों को दूध की कमी नहीं होने देते। चाहे शिवरात्रि हो या जन्माष्टमी, ईद हो या दीपावली इनकी भैंसें त्योहारों पर इतना दूध तो पैदा कर ही देती हैं कि लोगों की डिमांड पूरी हो जाय। यदि फिर भी कम पड़े तो थोड़ा बहुत पानी, डिटर्जेंट, पाम ऑयल, यूरिया या केमिकल मिलाकर यदि ये दूध की कमी को पूरा करते हैं तो इसमें क्या गजब करते हैं ? बाजार के नियमों के मुताबिक मांग और आपूर्ति में सन्तुलन बनाते हैं। अगर दूध की मांग को पूरा नहीं करते हैं तो दाम आसमान छूने लगेंगे। तब भी जनता और सरकार इन्हें ही दोष देगी। अब तुम ही बताओ ! देश की आबादी जिस रफ्तार से बढ़ी है मवेशी और उन्हें पालने वाले उससे अधिक रफ्तार से कम हुए हैं। जबकि दूध और दूध से बने उत्पादों की खपत कई गुना बढ़ गयी है। मावे से बनी मिठाइयाँ हों, आइसक्रीम हो, चॉकलेट हों या चीज, या फिर पनीर ये उत्पाद पहले से ज्यादा मात्रा में मार्केट में उपलब्ध हैं। तो तुम्ही समझो कि कहाँ से आता है इतना दूध ? गाँव तो शहर में बदल रहे हैं, और शहर में कोई मवेशी पालता नहीं। कोई पालना भी चाहता है तो उसके मवेशी शहर की सड़कों को ही डेरा बनाए रहती हैं और सरकार को यह गवारा नहीं सो उन्हें कांजी हाउस में डाल देती है। अब कांजी हाउस में कौन गाय या भैंस दूध देगी भला ? तो है न सरकार ही सरासर दादागिरी । अब अगर मिलावट की ही बात करें तो इस देश में कौन सी ऐसी चीज है जिसमें मिलावट नहीं होती ? सारा किचन तो मिलावट की छौंक से ही जायका बना रहा है। मैं तो कहता हूँ सरकारों में भी मिलावट नहीं है क्या ? वो कौन से दूध की धुली हैं ? कभी बामपंथी और दक्षिणपंथी का घालमेल करते हैं, तो कभी समाजवाद में पूँजीवाद को मिलाते हैं। कभी लोकतंत्र को राजतंत्र की तरह चलाते हैं तो कभी जनवाद को सामन्तवाद की तरह। कभी जनता के हाथ में शासन की डोर थमाने का स्वांग करते हैं तो कभी शासन की उसी डोर से जनता को हाँकने के लिए चाबुक बनाते हैं। राजनीति के इस घालमेल में कभी मिलावटखोर सरकार को छलते हैं तो कभी सरकार मिलावटखोरों को डराती है। पर सच तो यह है कि इस बाजीगरी में न सरकार छली जाती है और न मिलावटखोर डरते हैं। बस छली जाती है तो सिर्फ जनता और डरती है तो सिर्फ जनता। यही तो है मिलावट की कारीगरी, बाजार की बाजीगरी और सरकार की दादागिरी।

Thursday, 2 February 2012

कोशिश






नीले समंदर के भीतर
कहीं गहरे
तिमिर का आलेख तोड़ती
एक छोटी सी किरण
धरती का विस्तार नापते पंख
क्षितिज के ललाट पर उगता आसमान
भोर की पलकों पर 
चिडियों का कलरव
जीवन में रंग भरते
सरसों के फूल
सच तो है
उम्मीद का एक कतरा बन सकता है
सारथी सूर्य का
गंगा का भगीरथ
शिव की जटा का चन्द्र
बिगसते जीवन की लिपि

Wednesday, 1 February 2012

जीवन



वह जो टूट गया
वह जो छूट गया
विष्वास
बादलों के बीच चाँद
के खोये अस्तित्व जैसे
क्षितिज पर
सूरज की सरहदों को
छूने का अहसास
तिनका-तिनका नीड़
धूप के हाथों क्या हो सका पराजित ?
जीवन वह नहीं जो छूट गया
जीवन वह नहीं जो टूट गया
जीवन वह जो खिल रहा
जीवन वह जो मिल रहा
फाग का आलोक
अमावस का तिमिर
भोर का विष्वास
सांझ का सम्बल