Sunday, 5 February 2012


मिलावट की कारीगरी, बाजार की बाजीगरी और सरकार की दादागिरी

भारत की आबादी कब से एक अरब पार हो चुकी है। खेतों पर कितने सारे मॉल्स एवं मल्टीप्लेक्स की फसलें उग आई हैं। कांक्रीट के जंगल हैं कि सुरसा के मुँह की तरह बढ़ते ही जा रहे हैं। भारत में आसन्न खाद्यान्न संकट पर गम्भीर होते हुए मेरे मित्र ने जमाखोरी और मिलावट के खिलाफ चलाए जा रहे सरकारी अभियान की प्रशंसा करते हुए एक आम नागरिक की चिन्ता को उजागर किया। पर उनकी इस चिन्ता से मेरे मन में कुछेक बुनियादी सवाल ठोकरें मारने लगे। पहला यह कि आजादी के समय हमारे पास किसानी के लिए जितने खेत और जमीनें थीं, आज वह लगभग आधी ही रह गयी हैं। जबकि इस मान से हमारी आबादी चौगुना बढ़ चुकी है। फिर भी हमारे देश में खाद्यान्नों की कमी नहीं। आखिर कैसे ? पैदावार में बढ़त हुई भी होगी, तो भी कितनी ? तो फिर इतनी बड़ी आबादी के लिए खाद्यान्न की पूर्ति कहाँ से होती है ? मैं सोच ही रहा था कि मेरी नजर पेपर में छपी एक खबर पर पड़ी। जिसमें सरकार द्वारा मिलावट के खिलाफ अभियान चलाये जाने के फलस्वरूप कुछ दूध एवं घी विक्रेताओं पर छापेमारी की कार्यवाही की जा रही थी। पर मुझे इसमें साफ तौर पर सरकार की दादागिरी दिखाई दे रही थी। अरे भई ये भी कोई बात हुई ? एक तो इतनी मंहगाई में भी ये लोग मिलावट करके दूध के दाम इतने कम और स्थिर रखे हुए हैं। फिर चाहे कितनी भी डिमांड हो लोगों को दूध की कमी नहीं होने देते। चाहे शिवरात्रि हो या जन्माष्टमी, ईद हो या दीपावली इनकी भैंसें त्योहारों पर इतना दूध तो पैदा कर ही देती हैं कि लोगों की डिमांड पूरी हो जाय। यदि फिर भी कम पड़े तो थोड़ा बहुत पानी, डिटर्जेंट, पाम ऑयल, यूरिया या केमिकल मिलाकर यदि ये दूध की कमी को पूरा करते हैं तो इसमें क्या गजब करते हैं ? बाजार के नियमों के मुताबिक मांग और आपूर्ति में सन्तुलन बनाते हैं। अगर दूध की मांग को पूरा नहीं करते हैं तो दाम आसमान छूने लगेंगे। तब भी जनता और सरकार इन्हें ही दोष देगी। अब तुम ही बताओ ! देश की आबादी जिस रफ्तार से बढ़ी है मवेशी और उन्हें पालने वाले उससे अधिक रफ्तार से कम हुए हैं। जबकि दूध और दूध से बने उत्पादों की खपत कई गुना बढ़ गयी है। मावे से बनी मिठाइयाँ हों, आइसक्रीम हो, चॉकलेट हों या चीज, या फिर पनीर ये उत्पाद पहले से ज्यादा मात्रा में मार्केट में उपलब्ध हैं। तो तुम्ही समझो कि कहाँ से आता है इतना दूध ? गाँव तो शहर में बदल रहे हैं, और शहर में कोई मवेशी पालता नहीं। कोई पालना भी चाहता है तो उसके मवेशी शहर की सड़कों को ही डेरा बनाए रहती हैं और सरकार को यह गवारा नहीं सो उन्हें कांजी हाउस में डाल देती है। अब कांजी हाउस में कौन गाय या भैंस दूध देगी भला ? तो है न सरकार ही सरासर दादागिरी । अब अगर मिलावट की ही बात करें तो इस देश में कौन सी ऐसी चीज है जिसमें मिलावट नहीं होती ? सारा किचन तो मिलावट की छौंक से ही जायका बना रहा है। मैं तो कहता हूँ सरकारों में भी मिलावट नहीं है क्या ? वो कौन से दूध की धुली हैं ? कभी बामपंथी और दक्षिणपंथी का घालमेल करते हैं, तो कभी समाजवाद में पूँजीवाद को मिलाते हैं। कभी लोकतंत्र को राजतंत्र की तरह चलाते हैं तो कभी जनवाद को सामन्तवाद की तरह। कभी जनता के हाथ में शासन की डोर थमाने का स्वांग करते हैं तो कभी शासन की उसी डोर से जनता को हाँकने के लिए चाबुक बनाते हैं। राजनीति के इस घालमेल में कभी मिलावटखोर सरकार को छलते हैं तो कभी सरकार मिलावटखोरों को डराती है। पर सच तो यह है कि इस बाजीगरी में न सरकार छली जाती है और न मिलावटखोर डरते हैं। बस छली जाती है तो सिर्फ जनता और डरती है तो सिर्फ जनता। यही तो है मिलावट की कारीगरी, बाजार की बाजीगरी और सरकार की दादागिरी।

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