मतलबी इस दौर में सिमट रहा है आदमी,
आदमी को आदमी से पहचान करनी चाहिए।
पत्थरों की बस्तियाँ हैं, मॉल, मल्टीप्लेक्स हैं,
खेत और खलिहान की भी बात करनी चाहिए।
बिछ रही बिसात है सियासत के नाम पर,
जनतंत्र के कातिलों की पहचान करनी चाहिए।
नस्ल और मज़हब का परचम तख़्त पर आसीन है,
इस सन्धि को भी भेदने की, युक्ति बननी चाहिए।
काग़ज़ों पर तरक्क़ी के सपनों की सजावट है,
सपनों के सौदाग़रों की पहचान करनी चाहिए।
उसूलों के क़त्ल पर दीपावली मनती यहाँ,
इस चलन के खिलाफत की, तरकीब करनी चाहिए।
धूप से बचकर रहें क्यों ? रेत के टीले बनें क्यों ?
हिमालय से कर्म की भी गंगा निकलनी चाहिए।
धमनियों का खून जमकर मोम बनता जा रहा,
बर्फ की जागीर में अब आग लगनी चाहिए।
कोशिशें तो हो चुकी यह सूरत बदलनी चाहिए,
हुकूमत से निर्भीक स्वर में बात करनी चाहिए।
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