Wednesday, 14 March 2012

कहानी बेजुबान सड़कों की


         मानव सभ्यता के इतिहास में सड़क की खोज एक क्रान्तिकारी खोज कही जा सकती है। सड़कें नहीं होतीं तो शायद मनुष्य सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक रूप से इतनी प्रगति नहीं कर पाता। मैंने सड़कों के कई रूप देखे हैं। सड़कें बोलती नहीं पर महसूस सब कुछ करती हैं। एक बार मैंने देखा कि एक निर्जन स्थान में सड़कों की मीटिंग हो रही है। मीटिंग में सभी प्रकार की सड़कें भाग लेने के लिए आई हुईं थीं। बूढ़ी-जवान, नयी-पुरानी, मोटी-छोटी, चौड़ी-लम्बी। तरह-तरह की। मैंने आज तक किसी सड़क को बोलते नहीं सुना था, लेकिन आज सड़कों की मीटिंग में आश्चर्यजनक रूप से सड़कों को बोलते हुए प्रत्यक्ष देख रहा था। एक बूढ़ी सड़क, जिसके जिस्म पर बड़े-बड़े गढ्ढे़ दिखाई दे रहे थे, अपने दिल को जुबाँ पर लाती हुई बोली- हम सदियों से जुल्म सहती आ रही हैं। समाज ने कभी भी हमारी परवाह नहीं की। पर हमने कभी कुछ नहीं कहा। सभ्यता के विकास में जब से मनुष्य ने चक्के का निर्माण किया है हमारे लिए तो वह तबसे और अधिक असभ्य हो गया है। पहले हमारे जिस्म को बैलगाड़ियों और घोड़ों की टापों से रौंदा जाता था और अब बड़े-बड़े मोटे-मोटे चक्कों से। फिर भी हम चुप रहीं, पर अब समय आ गया है, जब हमें अपनी आवाज बुलन्द करनी चाहिए। मनुष्यों की कोई भी राजनैतिक, सामाजिक उठापटक हो सबसे पहले हमें ही निशाना बनाया जाता है। राजनीति के रहनुमां कभी राजनीति करके हमें बनवाते हैं तो कभी हमारे बनने पर राजनीति करते हैं। कभी हमारा नाम बदलकर राजनीति में अपना नाम पक्का करते हैं तो कभी अपने बाप-दादाओं के नाम पर हमारा नामकरण करके अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी राजनीति की सड़क तैयार कर लेते हैं। कभी हमें स्त्रियों की श्रेणी में रखा जाता है तो कभी पुरूषों की। अपने स्वार्थ के लिए कितनी ही बार हमारा लिंग परिवर्तन किया जाता है। कभी हमारा नाम रानी लक्ष्मीबाई मार्ग रखा जाता है तो कभी महात्मा गांधी मार्ग। मनुष्य कभी “सड़क छाप” कहकर  लुच्चे लफंगों से हमारी तुलना करता है, तो कभी “सड़क का भिखमंगा” कहकर हमारी लाचारी का उपहास उड़ाता है।
मनुष्य कितना चालाक हो गया है। कि अपने स्वार्थ के लिए हमारे अलग-अलग नाम रखकर हममें फूट डालने की कोशिश करता है, कभी हमारा नाम मेन रोड रखता है, तो कभी संकरी गली, कभी राष्ट्रीय राजमार्ग रखता है, तो कभी पगडंडी या पहुँच मार्ग। पर हम सब समझती हैं। हम मनुष्यों की तरह कभी आपस में चील और लकड़बग्घों की तरह रार नहीं मचातीं। हम कभी भी बारूदी के नारों से अपनी कौम को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश नहीं करतीं। 
आजकल तो नया ट्रेंड शुरू हो गया है। जिसे नगर निगम की भाषा में तो पता नहीं क्या कहते हैं पर अंग्रेजी में इन्क्रोचमेन्ट और हिन्दी में अतिक्रमण कहते हैं। पहले तो केवल सब्जी-भाजी  और ठेले वाले ही हमारे जिस्म को दोनों ओर से दबोचते थे पर अब तो अच्छी खासी दुकान वाले भी हमें बख्शने को तैयार नहीं। देखिये मनुष्य कितना सयाना हो गया है, अपनी दुकान का सामान सड़क पर रखने के लिए कभी सड़क के बीच में प्याऊ लगा लेता है तो कभी दो चार पत्थरों का चबूतरा बनाकर देवता की पेढ़ी का स्वांग करता है। उसको मालूम है कि प्याऊ को कोई तोड़ेगा नहीं और देवता की पेढ़ी के बहाने लोगों की भावनाओं को आसानी से भड़काया जा सकता है। तो इनकी आड़ में दबाते रहो सड़कों को। आने-जाने वाले चाहे कसमसाते रहें पर यहाँ दूसरों की किसे परवाह? हिन्दुस्तान के आधे से ज्यादा दूल्हे तो सड़कों पर तम्बू गाड़कर ही ब्याहे जाते हैं। नौ दिनी गरबे हों या दस दिनी बप्पा की स्थापना। हम सड़कें नहीं होतीं तो हिन्दुस्तान के लोग इतने बड़े-बड़े सांस्कृतिक उत्सव कहाँ मनाते? और शायद हिन्दुस्तान के आधे युवा तो बिन ब्याहे ही रह जाते। बीच सड़क पर होली जलाना, छोटे-बड़े आयोजनों के लिए बीच सड़क पर तम्बू गाड़ना, सड़क पर कचरा फेंकना, अपने घर के गंदे पानी की नाली का बहाव सड़क पर करना, अपने मकान बनाने के लिए ईंट, रेत-बजरी का ढ़ेर सड़क पर लगाना तो जैसे हमारे देश की सभ्यता में शामिल हो गया है। 
  एक नयी-नवेली सड़क अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए बोली- किसी नेता, अभिनेता या महात्मा के आगमन पर हमारी छाती के बीचों-बीच मोटी-मोटी कील ठोककर बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाये जाते हैं और हम उफ़ तक नहीं करती। इतिहास गवाह है कि अब तक जितनी भी लड़ाइयाँ लड़ी गयी हैं वे सब सड़कों पर ही लड़ी गयी हैं, पर अब तो हर कोई सड़कों पर उतरने की धमकी देता रहता है। आज तक हमने न कोई आन्दोलन किया, न धरना दिया और न हड़ताल पर गये। अगर हम एक भी दिन हड़ताल पर चले गये तो इंसानों को अपनी औकात पता चल जायेगी। यह हमारा बड़बोलापन नहीं बल्कि सच्चाई है। देश और समाज की खुशहाली, समृद्धि, एकता तथा अखंडता में हमारी अपनी बड़ी भूमिका रहती है। उत्तर-दक्षिण की एकता हो या पूरब-पश्चिम का समन्वय, गाँव को शहर से मिलाना हो या शहर को महानगर से, खेतों की लहलहाती फसल को बाजारों तक लाना हो या देश की सीमाओं की रखवाली करते जवानों को रशद पहुँचानी हो, हम अपने कर्तव्य से कभी विमुख नहीं होती हैं। .......... और यह सोचकर सड़कों ने सर्व सम्मति से हड़ताल पर न जाने का फैसला किया।

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